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एक ग्राम संगठन जो पहलकदमी ले सकता हैं

'कीमत कौन चुकाएगा? क्य तुम खरीद रहें हो? बरदेला गांव (पूर्णिया) के एक किसान ने पूछा, जब खनवा गांव के निराला ग्राम की अध्यक्ष रवीना खातून उनके साथ 46 क्विंटल चावल के लिए मोलतोल किया। उन्हें विश्वास नहीं था कि ये पांचो मामूली औरते- रवीन खातून,सीता देवी,चनकी देवी, अनीता मुरमू और तरिया खातून- इतनी मात्रा में खरीद सकती हैं। यहां तक कि जब दर तय हो गया और ट्रक किराए पर ले लियी गया, तब भी उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि वे लोग तत्काल भुगतान कर देगीं। वह आश्चर्यचकित रह गए जब रवीना खातून ने उन्हें 1,275 रू. प्रति क्विंटल की दर से 59,650 रू. का भुगतान किया (जिसमें जूट के बोरे और परिवहन का व्यय भी शमिल हैं)। विजेता महिलाएं रास्ते में पड़ने वाली स्वंय सहायता समूहों के पास बोरे को उतरवाती वापस लौटीं। तौल की कठनाई से बच्ने के लिए चावल 50 कि.ग्रा. के थैलों में पैक किया गया था। उनलोगों ने समूहों को चावल 1,300 रू. प्रति क्विंटल की दर से उपलब्ध करा दिया जिससे कुल मिलकर 9 स्वंय समूहों में 12 परिवारों को फायदा पहुंचा। बाजार मूल्य 1,400 से 1,500 रू. प्रति क्विंटल था। महत्वपूर्ण बात यह हैं कि चावल सामुदायिक निवेश विधि (सीआइएफ) और ग्राम संगठन के धन से खरीदा गया था। यह ग्राम संगठन के स्तर पर काफी पहले (नवबंर 2009) में ली गई पहलकदमी थी, जब खाद्द सुरक्षा योजना अधिकृत रूप से शुरू हुई थी।और निराला ग्राम संगठन अपने एक सहायता समूह - अलहमदुलिल्लाह समूह द्वरा किए गए सामूहिक विपणन से उत्साहित था।



सामूहिक कार्यवाई का एक पुल

जून का दूसरा सप्ताह हैं। बरसात अभी वस्तुतः शुरू नहीं हुई हैं इसके बावजूद गिदराही गांव (पूर्णिया) पहुंचने के लिए आपको घुटनों पानी में चलना पड़ेगा। बरसात में जल स्तर खतरनाक ढ़ग से बढ़ सकता हैं और आना- जाना काफी कठिन हो जाता हैं। तब आना- जाना आसान बनाने के लिए चंचरी पुल (बांस का बना अस्थायी पुल) उपयोग लायक नहीं रह जाता हैं।पूरी तरह संथाल (अनुसूचित जनजाति) महिलाओं द्वारा गठित प्रकाश जीविका ग्राम संगठक की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा होती हैं। 'जिनके पास बांस के बखार हैं, वे बांस दे दें ताकि चचरी की मरम्मत की जा सके', जीवन प्रकाश स्वंय सहायतासमूह का प्रतिनिधित्व कर रही सदस्य उषा बेसरा ने प्रस्ताव केया। 'जिनके पास बांस हो वे दे दें और अन्य लोग चंचरी की मरम्त के लिए रस्सी और अन्य चीजें खरीदने के लिए पैसे दे दें', जीवन ज्योति स्वंय सहायता समूह का प्रतिनिधित्व कर रही मेरी मुरमू ने जोड़ा। अंततः तय किया गया कि ग्रामीणों का भी सहयोग लिया जाएगा, लेकिन बांस या रस्सी खरीदने और जरूरत अनुसार मजदूर को भुगतान हेतु पैसे देने के लिए श्रमदान करने के लिए सदस्यों को तैयार रहना चाहिए।



सुजनी की शुरूआत

उचित बारीकी और पैकिगं पारंपरिक ग्रामीण कला को महंगे उत्पाद में विकसित कर सकती है। सुजनी (कढ़ाई) के मामले में ऐसा ही हैं। जीवका द्वारा इसे मुजफ्फरपुर जिले के बोचहा प्रखंड के दो गांवों- सरफुद्दीनपुर और मदन चौपड़- में दो ग्राम संगठनों- दुर्गा और चादंनी- के जरिए दलित तब के महिलाओं को उपार्जन करने और उसके जरिए गरीबी दूर करने में मदद के लिए प्रोत्साहित किया ज रहा हैं। ग्राम संगठन की मांग पर बिहार ग्रामीण जीविका कार्यक्रम के जरिए दि चरणों में प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई। कार्यक्रम का संचालन दिल्ली आधारित एक अभिकरण के प्रतिष्ठित वस्त्र एंव फैशन डिजाइनरों ने किया। कुल मिलाकर 15 महिलाओं ने सुजनी का प्रशिक्षण प्राप्त किओया। चुनी गई तो महिलाओं- शकुंतला देवी और नजमा- को दिल्ली भी बुलाया गया।


महिलाएं साड़ी, दरी, थैले, लैंप कवर आदि पर सुजनी बनाती हैं। इन महिलाओं को अपना काम जारी रखने के लिए कहा गया हैं क्योंकि उनकी बनाई चीजों को एकत्र किया जाएगा और उन्हें उचित भुगतान किय जाएगा। उनकी बनाए चीजों की काफी मांग् हैं। उनकी कलात्मक चीजों को खरीदने के लिए अनेक अभिकरण उनके पास पहुंचते रहते हैं।



श्री- चार मन प्रति कट्ठा

'मेरे पति चावल सघनीकरण प्रणाली (श्री) अपनाने के लिए बिल्कुल सहमत न थे। "अगर यह असफल हो गया, तो हम क्या करेंगें? "वे पूछते थे। लेकिन मैं आश्वस्त थी। हमलोगों के पास दो कट्ठे का एक प्लॉट था जो बरसों से परती था। मैंने अपने बेटे के साथ मिलकर परती की खुदाई की और उसे खेती लायक बनाया। हमलोगों ने निर्देश के अनुसार बेड तैयार किया, नमक का उपयोग कर बीज का उपचार किया, बीजों की नर्सरी तैयार की और बारहवें दिन उन्हें रोप दिया। "अपना खेत और ताकत बर्बाद करने के लिए तुम्हीं जिम्मेंवार होगी" , मेरे पति अक्सर मुझे ताना देते थे जब तक रोपनी के आंठवे दिन पौधे का विकास दिखने नहीं लगा। जैसे- जैसे पौधे बढ़ते गए, लोग प्रभावित होते गए। अंततः हमलोगों को चार मन प्रति कट्ठा उपज मिले जो हमलोगों के सबसे अच्छे प्लॉट पर मिलने वाली उपज की चारजुनी थी। मेरे पति जान गए कि श्री विधि धन की रोपनी के लिए कितनी उपयोगी हैं।' गया जिले के भुसिया गांव की सधा देवी-2 ने बताया।



ग्राम साधनसेवी को जल्दी- जल्दी आना चाहिए

आप तो हमलोगों को यह विधि अपनाने के लिए बताकर वेतन पाती हैं, लेकिन हमलोग यह विधि क्यों अपनाएं? अगर यह विधि असफल होगी, तो हम खाएंगे क्या? लोग मुझसे पूछा करते थे, तो मैं आश्वस्त करते हुए बताती थी, 'अगर उपज नहीं होती है, तो मैं लोगों को जुर्माना दूंगी', नामा पंचायत की ग्राम साधनसेवी सुनीता देवी-1 ने कहा। 'हम साथे रहबौ, सब कुछ मामलों में पति और कुछ मामलों में पत्नियां भी हठ पकड़ लेती थीं काफी घिघियाने (चिरौटी करने) के बाद उनमें से कुछ सहमत हुए। उनको धान रोपने में मदद देने के लिए मैं उनके खेतों पर टोकरियों में बिचड़े भी लेकर जाया करती थी। हालांकि श्री विधि के जरिए अधिक उपज ने लोगों की मानसिकता बदल दी है। अब लोग शिकायत करहे हैं उनके गांव में जल्दी-जल्दी क्यों नहीं पहुम्चती हूं 'तोहरे देखले से हमे बीज नई रखलिएइ। पर साल तो घिघियाए रहल औ, ई साल न आवैछहू (तुम्हारे ही कारण हमलोगों ने इस साल बीज नही रखा है। पिछले साल तो तुम चिरौरी करती थी, लेकिन इस साल जल्दी-जल्दी आ भी नहीं रही हो)।



रणनीतिक संवाद

रणनीतिक संवाद का मुख्य उद्देश्य समुदाय में समुदायिक संस्था निर्माण प्रक्रिया का सुढृढ़ीकरण और उसका टिकाऊपन हैं। इसमें क्षेत्र स्तर पर क्रियान्वित होने वाले परियोजना के सभी घटकों के लिए सूचना, शिक्षा और संवाद सहायता शामिल हैं। जागरूकता कार्यक्रमों और अभियानों में ग्रामीण गरीबों के हित की सामाजिक और/या आर्थिक गतिविधियों, जैसे कि संस्था निर्माण, जीविका वृद्दि, बाल शिक्षा, बाल विवाह, एचाआइवी/एड्स आदि पर फोकस किया जाएगा। इस खंड के अंतर्गत निम्नलिखित गतिविधियां आएंगी।


* जीविका के विकल्पों तथा दृष्टियों के संबंध में जागरूकता निर्माण- पारदर्शी भागीदारीमूलक एवं जवाबदेह संस्था निर्माण प्रक्रिया आरंभ की गई सामुदायिक संस्थाओं के टिकाऊपन की कुंजी हैं। संवाद रणनीति बुनियाद निर्माण संबंधी जरूरतें पूरी करेगी।


* समुदाय आधारित संगठनों में चर्चा के लिए सामुदायिक और आर्थिक सशक्तीकरण संबंधी मुद्दों को रखने के लिए सामुदायिक संगठकों और सामुदायिक साधनसेवियों का प्रशिक्षण। परियोजना में अनुभवों को हासिल और प्रदर्शित करने तथा इन सामाजिक और आर्थिक हस्तक्षेपों के आधर पर समुदाय में संगठनों में सीखने की भी सामर्थ्य पैदा करेग।