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14. सूचना प्राप्ति हेतु उपलब्ध सुविधाएं

क्रम सं.

उपलब्ध सुविधाएं

उपलब्ध सूचनाओं की प्रकृति

काम का समय

1.

सूचना काउंटर

हमारे राज्य कार्यालय में उपलब्ध:
पताः बिहार ग्रमीण जीविका प्रोत्साहन सोसाइटी (बीआरएलपीएस), प्रथम तल, अनेक्स-2, विधुत भवन (दक्षिणी खंड) जवाहरलाल नेहरू मार्ग (बेले रोड), पटना-8000001(बिहार). 
सपंर्क नं.- 0612. 2205181 , 6452341

पूर्वाह्र 1:30 से अपराह्र 6:00 तक

2.

वेबसाइट

हाएं जिजचरूधधैतसचण्पद पर उपलब्ध

24 घंटे

3.

पुस्तकालय

हां

पूर्वाह्र 1:30 से अपराह्र 6 बजे तक

4.

सूचना पट

हां

पूर्वाह्र 1:30 से अपराह्र 6 बजे तक


परियोजना का उद्देश्य और रूपरेखा क्या हैं?
बिहार ग्रामीण जीविका परियोजना का उद्देश्य बिहार में ग्रामीण गरीबों का आर्थिक एंव सामाजिक सशक्तिकरण बढ़ाना हैं। इन गतिविधियों के जरिए इस उद्देश्य को पूरा करने का प्रयास करना है : ग्रामीण जीविक में सुधार तथा ग्रामीण गरीबों के समाजिक एंव आर्थिक सशक्तिकरण में वृद्धि करके; ग्रामीण गरीबों और उत्पादकों का संगठन बनाकर और उन्हें सार्वजनिक और निजी प्रक्षेप के अभिकरणों एंव वित्तिय संस्थाओं से सेवा, प्रदाताओं के क्षमता निर्माण में निवेश करके तथा सूक्ष्मवित्त और कृषि- व्यापार प्रक्षेत्र के विकास को बढ़ावा देने में उत्प्रेरक की भूमिका निभाकर।


इस परियोजना के अतंर्गत कौन- कौन क्षेत्र शामिल हैं?
बिहार ग्रामीण जीविका परियोजना बिहार के छः जिलों- नालंदा, गया,खगड़ीया, मुजफ्फरपुर, मधुबनी और पूर्णिया- में चल रही हैं। इन जिलों में परियोजना द्वारा 42 प्रखंडों के 4,000 गांवों में 5 लाख परिवारों के बीच काम करने की सोच है।


परियोजना कैसे काम करती हैं?
बिहार ग्रामीण जीविका परियोजना की मुख्य रणनीति स्वंय सहायता समूह के रूप में महिलाओं का स्पंदनशील तथा भरोसेमंद सामुदायिक संगठन निर्मित करना हैं, जो सदस्यों की बचत, आतंरिक ऋणप्रदान तथा नियमित वसूली के जरिए आत्मनिर्भर संस्थाएं बन जाए। गठित समूह अपनी बचत और चक्रानुसारी कोष (रिवॉल्विगं फंड) पर आधारित होंगे न कि सामुदायिक निवेश निधियों के एकल खुराक के ऊपर जो संस्था को अनुदान के बतौर दी जाती हैं। सदस्यता आधारित सामाजिक सेवा प्रदात, व्यापारिक अस्तित्व और औपचारिक बैंकिंग प्रणाली के मूल्यवान ग्राहक बनने के लिए प्राथमिक स्तर के स्वंय के स्वंय सहायता समूह ग्राम संगठन पर ग्राम संगठन में संघबद्ध होंगे। ऐसे सामुदायिक संगठन बाजार की विभिन्न संस्थाओं के लिए प्रदत्त बैंक एंड सेवाओं के लिए संवाददता, निजी क्षेत्र की कंपनियों के लिए अधिप्राप्ति (प्रोक्योंरमेंट) फ्रेंचाइजी और विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों के लिए सेवा प्रदान तंत्र के बतौर।

   परियोजना अपनी गतिविधियों का क्रियान्वयन प्रखंड परियोजना क्रियान्वयन इकाई में स्थित एक प्रखंड क्रियान्वयन दल के जरिए करती हैं। किसी जिले के विभिन्न प्रखंड परियोजना क्रियान्वयन इकाईयों के प्रयासों को जिला परियोजना समन्वय इकाई द्वारा समन्वित किया जाता हैं। समग्रतः परियोजना का प्रबंधंन पटना आधारित राज्य परियोजना प्रबंधंन इकाई द्वारा किया जाता हैं।


सूक्ष्मवित्त क्या हैं?
'सूक्ष्मवित्त' को प्रायः गरीब तथा निम्न आय वाले ग्राहकों के लिए वित्तिय सेवा बतौर परिभाषित किया जाता हैं। व्यवहार में इस शब्द का उपयोग और भी संकीर्ण अर्थ में खुद को 'सूक्ष्मवित्त संस्था' (एम.एफ.आइ) बताने वाले सेवा प्रदाताओं के ऋणों तथा अन्य सेवाओं के संदर्भ में किया जाता हैं।

   अवैतनिक ऋणार्थियों से मामूली बंधक (कॉलेटरल) लिए या बिना लिए उन्हें बहुत छोटी ऋणराशि देने के लिए इन संस्थाओं में सामान्यतः गत 30 वर्षों से भी अधिक समय के दौरन विकसित नई विधियों के प्रयोग का रूझान रहता हैं। इन विधियों में शामिल हैं- सामूहिक ऋण तथा देनदारी, ऋणपूर्व बचत संबंधी जरूरतें, ऋणों के क्रमशः बढ़ते आकार,तथा वर्तमान ऋणों के पूर्णतः और तत्परतापूर्वक चुक जाने पर भविष्य में उनकी तत्काल उपलब्धता की निर्विवाद गारंटी।

   और खुलकर कहें, तो सूक्ष्मवित्त एक आंदोलन को व्यक्त करता हैं जो ऐसे विश्व की कल्पना करता हैं जिसमें अपनी आयवर्धक गतिविधियां, परिसंपत्ति निर्माण, उपयोग के स्थिरीकरण, तथा जोखिमों से बचाव हेतु वित्तपोषण के लिए कम आय के लिए आय वाले परिवारों की स्थायी पहुंच उच्च गुणवत्ता वाली अनेक प्रकार की वित्तिय संस्थाओं तक हो। ये सेवाएं ऋण तक ही नहीं सीमित हैं। इनमें बचत, बीमा, और मुद्रा का हस्तांतरण भी शमिल हैं।


जीविका क्या होती हैं?
जीविका की परिभाषा पर विद्वानों और विकासकर्मियों के बीच काफी विचारविमर्श किया गया हैं (उदाहरणस्वरूप देंखे इल्लिस, 1118 बैटरबरी,20001; कार्नी, 1118; बर्नस्टीन, 1112; फ्रांसिस, 2000, 20002; रादोकी, 20002)। जीविका की सर्वाधिक स्वीकार्य परिभाषा राबर्ट चैंबर्स और गॉर्डन कॉनवे की कृतियों से निकलती हैं 'जीविका में जीवन साधनों के लिए वांछित क्षमत, परिसंपत्तियां (जिनमें भौतिक संसाधनों और समाजिक संसाधन, दोनो शामिल हैं) तथा गतिविधियां शामिल हैं (कॉने, 1118.4)। इल्लिस (2000) ने जेविका की परिभाषा 'किसी व्यक्ति अथवा परिवार द्वारा हासिल जीवन को संयुक्त रूप से तय करने वाली गतिविधियों, परिसंपत्तियों, और पहुंच' के बतौर सुझाया हैं। 1180 के दशक के प्रारंभ में लंदन में जीविकाओं पर शोध करने वाली बालमैन (1184) जीविकओं को सदा आश्रयस्थल पाने या बनाने, मुद्र उपार्जित करने, तथा खाने ये बजार विनिमय हेतु भोजन तैयार करने से बड़ी बात मानते हैं।

  उतनी ही यह स्वामित्व और सूचना के प्रसार्, सामाजिक संबंधों का प्रबंधन, व्यक्तित्व महत्व और सामूहिक पहचान की पुष्टि, तथा इनमें से प्रत्येक कार्य मिलकर जीविका का निर्माण करते हैं। वॉलमैन जैसे नेतत्वविज्ञानी के लिए जीविक एक व्यापक संकल्पना हैं। उनक सुझाव हैं कि सामाजिक जीवन कई स्तरों में होता हैं और ये स्तर एक- दूसरे पर चढ़े होते हैं। जीविकाओं के विचार का यह एक महत्व्पूर्ण विश्लेषणात्मक फीचर हैं

  एक फीचर पर सारी परिभाषाएं एंव व्यख्याएं एक हैं। यह कि सामान्य रूप से स्वीकृत इस विचर को सशक्त ढ़ंग से रेखाकिंत करते हैं कि 'जीविका का संबंध लोग, उनके संसाधनों तथा उनके जरिए किए जाने वाले कार्यों से हैं। जीविकाए अनिर्वायतः संसाधनों (जैसे जमीन, फसलें, बीज, श्रम, ज्ञान, मवेशे, मुद्रा सामाजिक संबंध आदि) के इर्दगिर्द घूमती हैं, लेकिन इन संसाधनों को पहुंच तथा बदलती राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों संबंधी मुद्दों और समस्याओं से अलग नहीं किया जा सकता हैं।

   जीविकाएं नए अवसरों के निर्माण और लोंगो द्वारा अपनाए जाने से भी संबंधित हैं। जीविका पाने या इसके लिए प्रयास करने में लोगों को जोखिमों और अनिश्चतताओं- जैसे अनियमित बारिश, संसाधनों का घटते जाना, जमीन पर दबाव, बदलता जीवनचक्र और रिश्तों का नेटवर्क, एच.आइ.वी/ एडस जैसे रोग, अव्यवस्थित बाजार, खाद्द पदार्थों की बढ़ती कीमते, मुद्रास्फीति, और राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा- का भी सामन करना पड़ सकता हैं। नए उभरते अवसरों से युक्त ये अनिश्चितताएं इस पर भौतिक तथा समाजिक संसाधनों का कैसे उपयोग किया जाय, और लोगों द्वारा अपनाएं जाने वाले विकल्पों पर निस्संदेह प्रभाव डालती हैं।


गांवों पर फोकस शहरों पर क्यों नहीं?
'दुनिया के अधिकांश गरीब ग्रामीण हैं, और अनेक दशकों तक ग्रामीण बने रहेंगे। अतएव गरीबी निर्माण योजनाओं को अगर सफल होना हैं, तो उन्हें गांवो को अवश्य फोकस करना चाहिए।'- अंतरार्ष्ट्रीय कृषि विकास कोष की 'ग्रामीण गरीबे रिपोर्ट 2000/20001, फैक्टशीट- द रूरल पूअर'

  जहां झोंपड़पटिट्यों, कूड़ा भरी रेल लाइनों पर खेलते बच्चे और ट्रफिक लाइट के समीप अनगिनत भिखरियों की कतार वालों शहरों की छवि से भारत आने वाले आगंतुको को धक्का लगता हैं, वहीं 70 प्रतिशत भारतीय अभी भी गांव-देहात में रहते हैं जहां चारो ओर भंयकर गरीबी फैली हैं।

   भारत में ग्रामीण गरीबों का स्तर हतोत्साहित करने वाला हैं। पूरे अमेरिका जितनी बड़ी आबादी एक डालर से भी कम, लगभग आधे डालर रोजाना में जीती-मरती हैं। अधिकांश देहाती ग्रामीण भूमिहीन मजदूर हैं। वे काम के मौसम में अपना श्रम बेचने पर निर्भर हैं जहां पारिश्रमिक नामात्र का होता हैं और अवसर बहुत कम। वर्ष के शेष दिनों में उन्हें कोई नियमित आय नहीं होती हैं।

  ग्रामीण गरीबों को लक्ष्य बनाना 'गरीबी उन्मूलन' घर के लिए ही नहीं हैं। इसका संबंध ग्राम समुदायों में नई जान फूंकने और युवा- युवतियों को अपने गांवों में टिके रहने के लिए आशा और मकसद प्रदान करने से भी हैं। हर साल लाखों युवा ग्रामीण, जिनमें सामान्यत पुरूष होते हैं, गांव की प्रतिभा और ताकत साथ लिए कम की तालाश में शहरों की ओर कूच करते हैं और शहरी अधिसंरचना पर दबाव बढ़ाते हैं।

  उड़ीसा में हमारे क्रियान्वयनकारी साझेदार ने दावा किया- 'प्रशिक्षण के पहले इन गांवों से पलायन एक नियमित परिघटना थी, लेकिन प्रशिक्षण के बाद प्रशिक्षित कारीगरों का पलायन शत-प्रतिशत रूक गया है। उनमें से अनेक लोगों स्थानीय सामग्रियों से दूसरों के मकान बनाने के साथ-साथ अपने मकान भी बना रहे हैं।' जीविका ट्रस्ट ने महिलाओं समेत 1,200 कारीगरों को किफायती भवन निर्मान कौशल में प्रशिक्षित किया था।


महिलाओं पर फोकस क्यों?
गरीबी लिंगनिरपेक्ष नहीं होती। महिलाओं की जमीन, ऋण, प्रोद्यौगिकी, शिक्षा, स्वास्थ्य संबंधी देखरेख और कुशलतापूर्ण कार्यों तक कम पहुंच और नियंत्रण होता है। - अंतर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष की 'ग्रामीण गरीबी रिपोर्ट 2000/2001, फैक्टशीट - द रूरल पूअर'

  भारत में महिलाओं के साथ नियमित रूप से भेदभाव होता है, लेकिन अपनी ही नहीं, अपने परिवारों और आसपास के समुदायों का भी फीचर बदलने में उनकी भूमिका होती है।

  अपना और अपने परियोजनों का जीवन सुरक्षित करने के लिए ग्रामीण महिलाओं को नियमित रूप से अनेक प्रकार के कार्यभार सिर पर लेने पड़ते हैं। पशुओं और फसलों की देखभाल करके ही नहीं, घरेलू कार्यों का पूरा होना सुनिश्चित करके भी महिलाएं आम तौर पर अपने परिजनों की वित्तीय जीविका में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसके बावजूद, स्वयं सहायता समूहों में मिलजुलकर काम करने से सशक्तीकृत होने के बाद महिलाओं ने दर्शाया है कि वे धीमी गति से ही सही, किंतु निश्चित तौर पर सदियों पुराना भेदभाव और पूर्ण आर्थिक निर्भर्ता समाप्त करने, सम्मान पाने, अपने विचार रखने, अपने सूक्ष्म उद्यम का प्रबंध करने और गांवों में नई जान फूंकने में सक्षम हैं।

  अगर कोई महिला परिवार को पीने के पहले पानी को उबाल लेना सिखाने में सक्षम हो, तो उन्हें जनजनित रोगों से बचा सकती है। अगर कोई महिला दूध और बच्चे देने वाली बकरी पालने मे सक्षम हो, तो वह परिवार को पोषण का मूल्यवान श्रोत ही नहीं उपलब्ध करा सकती है, समुदाय के अन्य परिवारों को उसकी संतान भी देने में सक्षम हो सकती है।


ग्रामीण भारत में गरीबी का क्या मतलब है?
विकसित विश्व के हम जैसे लोगों के लिए ग्रामीण भारत के करोड़ों लोगों द्वारा रोज-ब-रोज झेली जा रही कठिनाइयों के साथ जुड़ पाना कठिन है। परिवार के अस्तित्व का बोझ खास कर महिलाएं और बच्चे उठाते हैं।

  ग्रामीण भारत में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले 28 करोड़ से भी अधिक लोगों के लिए गरीबी का यह मतलब हैः

  जल और पोषण की कम उपलब्धता ... महिलाएं और बच्चे पीने, खाने पकाने और बर्तन धोने हेतु पानी पीने और लाने के लिए मीलों चलते हैं।... 13.8 गरीब लोगों को साफ और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध नहीं होता है।

   तेज धूप और मूसलाधार मानसूनो बारिश से ... वहनीय आश्रयस्थल की कम उपलब्धता ...

   स्वास्थ्य सेवाओं, स्वास्थ्य शिक्षा तथा स्वच्छता की कम उपलब्धता ... यह भी मालूम नहीं कि जलजनित बीमारियों से कैसे लड़ा जाय या कुपोषन से कैसे बचा जाय ... 63.9 प्रतिशत लोग समुचित निकासी व्यवस्था के बिना ही रहते हैं।

  साक्षरता तक कम पहुंच ... लिखित सूचना तक पहुंचने या नजदीकी प्राथमिक विद्यालय से दूर स्थित गांवों में बच्चों को शिक्षित करने की अक्षमता ... आधी से अधिक भारतीय महिलाएं पढ़-लिख नहीं सकतीं और उनमें से अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों की हैं।

  गांव की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी तक कमजोर पहुंच ... मानवोचित तथा संवैधानिक अधिकारों का दावा या उपयोग करने या गांव के मामलों में कोई बात रखने के लिहाज से शक्तिहीन।

  आयवृद्धी के कमजोर अवसर ... भिन्न आर्थिक भविष्य बनाने, यहां तक कि उसका सपना देखने में भी अक्षम। भेदभाव और निर्भरता से बचने की कोई गुंजाइश नहीं।

  यह भारत का एक और चेहरा है। ग्रामवासियों की जल, आष्रय, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, साक्षरता और मानवोचित गरिमा तक पहुंच पहले किसी भी समय से अधिक भंगुर है।

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